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Pushpanjali / पुष्पांजलि

जिस महापुरुष ने भूमण्डल पर आकर धर्मद्वेषसे दग्ध हुए जीवोको सामान्य धर्मरूप अमृत पिलाकर सजीव किया इस ग्रन्थकी पहिली भेट उसी श्री कबीर साहिब के चरणोमें को जाती हे।

दूसरी भेंट - कबीर पन्थके संस्थायक श्री धर्मदासजी तथा उनके व्यालीस वंशको है जिन्होने आजतक साहिब के सिद्धान्तों की रक्षा करते हए उन्हे कार्य्य रुपमें परिणत किया ।

तीसरी भेंट--उनको है जो इस खीचातानी के समयमें भी अपने पन्थको कबीर साहिब काही एक पन्थ समझते हें ।

चौथी भेंट-- इस पन्थके उन सन्त महन्तों को है जो इस कराल कलिकालकी चपल तरगों के झोकों को वारंवार सहकर भी साहिबके बताये हए पंथ पर दृढ हें जो कि कबीर साहिबकी वाणीका सच्चा तात्पर्य समझते हैं |

मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा ।।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागे है मोर ।।

-- माधवाचार्य ।